Saturday, May 1, 2021

शब्द







                   " शब्द"

शब्द केवल अक्षरों का समूह नहीं है,
है मेरे तमाम उलझनों का सुलझा सा जवाब ,
मेरे बेचैनियों का शुकून भरा जवाब ,
 मेरे अनसुलझे मन का एक सुलझा सा जवाब,
हर दर्द का मरहम भी है और मेरे आत्मा का शुकून भी,
शब्द ही मैं और शब्दों में ही मैं भी ,
जीवन का गूढ़ रहस्य भी है और ,
जरिया भी है मुझे जानने का,
मेरे विचारों ,कल्पनाओं का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है,
मेरी नजरों और उस काल का,
 प्रत्यक्ष भावनात्मत अभिव्यक्ति भी है,
मेरे शब्द ही उस काल यथार्थ है,
मेरे शब्द ही मेरे मन की शुद्धता का प्रमाण है ,
मेरे शब्द मेरे जीवन के विचारों की गुथी हुई माला भी है,
शब्द ही रहस्य है इस ब्रह्माण्ड का,
सदियों से चली आ रही परंपराओं का ,
हर अनसुलझे प्रश्नों का ,
हमारे विधियों और हमारे अधिकारों का ,
जीवन के अस्तित्व का आरंभ भी है ,
पीढियों को लगातार सृजित करने का माध्यम भी है ,
शब्द केवल अक्षरों का समूह नहीं है ,
आरंभ से चली आ रही विचारों,
भावों,विकास,संस्कार ,संवेदनाओं,प्रश्न ,आदि ,
के अस्तित्व की गाथा है ,शब्द 
मर्म की अभिव्यक्ति है तो विचारो ,
इच्छाओं ,कल्पनाओं , भावों ,पशु पक्षी,
सजीव ,निर्जीव के अनकहे अल्फाजों की ,
एक काल्पनिक,भावपूर्ण अभिव्यक्ति है,
शब्द क्या है ? अपरिभाषित 
और मैं निःशब्द हूं ........

Sunday, April 25, 2021

उम्मीद मत छोड़ना

उम्मीद नहीं छोड़ना,
नहीं बिल्कुल भी नहीं छोड़ना उम्मीद का दामन ,
हर दिन अंधेरे के बाद उजाला होता है ,
हर दर्द के बाद ही मरहम मिलता है ,
हर डूबती नाव को पतवार मिलती है ,
नहीं छोड़ना उम्मीद का दामन ,
है पहलू जिंदगी का सुख दुःख,
हर ढलते शाम  के साथ सुबह का उजाला होता है,
हर हार के बाद जीत होती है ,
हार होना भी पूरा हार कहां होता है?
वह तो हमे और मजबूती देता है ,
सफलता के लिए उम्मीद देता है ,
बस तुम उम्मीद मत छोड़ना ,
यह वक्त भी गुजरेगा ,
नया सवेरा खुशियों भरा लायेगा ,
फिर जीवन में नई कोपले आएगी,
फिर फूल बन हम मुकुराएंगे,
बस खुद को और लोगों को ,
साथ लेकर चलना है ,
उन्हें डर,चिंता और अकेलेपन के,
 सोच से बचाना है ,
हम साथ है हर बार की तरह ,
यह विश्वास दिलाना है , हां
बस उम्मीद मत छोड़ना ,
हम साथ है हम एक है ,
हर वक्त यह साथ निभाना है ,
यही उम्मीद बनाए रखना है ........

Monday, December 14, 2020

नुमाइश



                   "  नुमाइश "

सभी लोग तैयारियों में सुबह से जुटे हुए थे ,क्योंकि आज मीरा के भईया के लिए सभी लोग लड़की देखने जाने वाले है ,सभी तैयार हो रहे है ।
तभी दादा जी बोले - "सामान को गाड़ी में ही रहने देना लड़की जब पसंद आ जाएगी , तय तमाम हो जाएगा तब हम अपनी तरफ से कुछ देंगे ।"
दादी बोलती है - हां,और नहीं तो क्या!
सुबह के 10 बजने वाले है ,गाड़ी घर के सामने आती है सब एक दूसरे को बोलते है कि जल्दी करो नहीं तो हम समय से नहीं पहुंच सकेंगे ,मीरा के पिता जी नहीं थे ।
मीरा ,भईया ,कुछ नजदीकी रिश्तेदार सब गाड़ी में बैठे और निकल गए , मंदिर पहुंचकर सब एक दूसरे से अपने हुलिए को पूछते है ,मीरा भईया का कोट सही करते हुए बोलती है "भईया अच्छे से देख लेना सांवली तो नहीं, तिरछे तो नहीं देखती ,और भी सब ।"
      सब लोग लड़की के घर वालो के पास गए सबको उन्होंने अभिवादन किया ,बैठाया ,पानी पिलाया ।फिर लड़की को बुलाया गया और बैठा दिया गया सब उसे देख रहे है ऐसे मानों कोई नुमाइश के लिए सामान खड़ा किया गया हो ,मीरा अपनी बुआ से बोलती है -" लड़की के चेहरे पर बहुत दाने दिख रहे " ।
      बुआ बोलती है - "सांवली भी है , उसे बाहर टहलने को ले जाना ,पता चल जाएगा कि कहीं कोई दिक्कत तो नहीं ,कहीं बहुत ज्यादा छोटी तो नहीं है "।
मामी ने पढ़ाई वगैरह पूछा ,लडके ने एक नजर किसी तरह देखा और फिर कुछ पूछने को बोला गया लेकिन उसने पूछा नहीं ।
    मीरा बोलती है लडकी से -"चलिए बाहर टहल कर आते है आप पैर में सैंडल मत पहनना "।
वह साथ - साथ चलती है और बुआ पीछे से देखती है कि मीरा से छोटी है या बड़ी लंबाई में । मामी कुछ सवाल पूछती है - ताकि पता चले कि लडकी  को कहीं बोलने में दिक्कत तो नहीं ।
कुछ खाया  पीया लोगों ने लड़की के पिता नहीं थे सिर्फ भाई ही था और उसकी मां और भाभी और कुछ रिश्तेदार ।
       लड़के की मामी ,मीरा ,बुआ ,लड़का सभी बाहर आ गए ,लड़का बोला -"मुझे लड़की नहीं पसंद ,सांवली है,मुझे शादी नहीं करनी इनसे "।
मीरा बोली -"हां ,बिल्कुल सही मुझे भी नहीं पसंद ,जैसी फोटो भेजी गई थी उतनी अच्छी नहीं है ।"
  मामी बोलती है - "लड़की इतनी बुरी नहीं है अच्छी ही है,किसी की लडकी को देख कर ऐसे सीधा मना करना अच्छा नहीं है या तो पहले घर पर देख लिया होता ऐसे मंदिर या इतना बड़ा कार्यक्रम नहीं करवाना चाहिए था ।
अब आ गए है देख लिया 5लाख दे रहे है और भी 1,2लाख  और देंगे कर लीजिए ।"
        लड़का मना करता है यह बात लडके के भाई तक पहुंचती है वह बोलता है 1,2लाख और दे देंगे सोने की चैन दे देंगे ,शादी कर लीजिए ,मेरी बहन शालीन है आपकी हर बात मानेगी ,पढ़ी  - लिखी है , पढ़ाती थी बच्चों को,उसे घर के सारे काम आते है , शादी न तोड़िए कर लीजिए ।
लेकिन शादी टूट जाती है  ।
लड़का कुछ नहीं करता सिवाय किसी निजी कम्पनी में किसी कर्मचारी के पद पर है मासिक तनख़ाह सिर्फ  पंद्रह हजार है  और घर में बहुत ज्यादा जमीन भी नहीं है ।
    समझ नहीं आता कि जब एक लड़की की शादी होती है तो यह सोचती है कि उसके पिता पर अधिभार ज्यादा नहीं हो लेकिन वह सोच वह भाव तब खत्म कैसे हो जाता है जब उसी लडकी के लडके की शादी की बात होती है ,क्या फिर एक लड़की की जिंदगी वहां नहीं है क्या फिर कोई पिता उस जगह नहीं है ,क्या कोई मां उस जगह नहीं है ,बदलाव के लिए घर से ,एक परिवार ,एक व्यक्ति से शुरू नहीं किया जा सकता यह आखिर क्यों ?
     क्या किसी इंसान का वजूद सिर्फ उसके बोल लेने ,ढंग से चल लेने ,रंग साफ होने ,पैसे ,धन - दौलत ,लंबाई से ही है ,मानों कोई सामान खरीदने गए हो और उसे ठोक बजा कर देख लिया ।माना कि पूरी जिंदगी का सवाल हैं लेकिन जो आप देखने गए वह जिंदगी गुजारने के लिए बहुत है क्या वह बाहरी सुन्दरता स्थिर है ,क्या दहेज में मिला धन स्थाई है ,स्थाई यदि है तो सिर्फ सामने वाले का व्यक्तित्व,उसके विचार ,जिसके बारे में यह समाज रत्ती भर भी नहीं सोचता ,क्या यह सही है ? 


 महिमा सिंह(यथार्थ अभिव्यक्ति)

Saturday, November 28, 2020

घरेलू हिंसा की एक झलक


 
घरेलू हिंसा जैसा कि शब्द से ही  अर्थ प्रकट होता है कि घर में  होने वाली हिंसा चाहे वह बच्चियों के साथ हो या महिलाओं के साथ। हिंसा विभिन्न प्रकार के हो सकते है जैसे मानसिक ,शारिरिक , यौनिक हिंसा व अन्य ,हिंसा से तात्पर्य है कि कोई भी ऐसा कृत्य जो कि उक्त व्यक्ति की इच्छाओं के विरुद्ध हो रहा है ।
          भारतीय परिदृश्य में परिवार ,समाज ,परम्परा ,रीति रिवाज  को हमेशा से व्यक्ति की इच्छाओं से सर्वोपरि माना जाता है खाशकर जब बात महिलाओं की हो ।
महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में सबसे बड़ा अपराध उनके पतियों और सम्बन्धियों द्वारा किया गया क्रूरता पूर्ण व्यवहार है ।हर एक घंटे में ऐसे 10 मामले दर्ज होते है यह तो रिपोर्ट किये गए आकड़ो का जायजा है लेकिन भारतीय समाज में पारिवारिक व सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला देकर ऐसे मामले अक्सर दर्ज ही नहीं कराए जाते है।छेड़छाड़ ,पतियों द्वारा बलात्कार,दहेज उत्पीड़न ,स्वतंत्रता पूर्व जीवन जीने का अवरोध व अन्य ऐसे मामले है जो लगातार बढ़ते ही जा रहे है ।
             घरेलू हिंसा में महज शारिरिक हिंसा ही नही आता है मानसिक हिंसा जैसे पढ़ने से रोकना ,मर्जी के विरुद्ध शादी तय करना ,अपनी मर्जी के व्यवसाय चयन करने से रोकना,  आवागमन की स्वतंत्रता का न होना ।
मौखिक हिंसा ,भावनात्मक हिंसा ,आर्थिक हिंसा भी घरेलू हिंसा का ही भाग है ।
              आज की स्थिति यह है कि  महिलाओं के अंदर डर और अपनी बात न कह पाने की स्थिति इस कदर बन गयी है कि अपने साथ हुए बर्तावों को वह अपनी मां - बाप से भी नहीं कह पाती है इसका मुख्य कारण यह है कि अक्सर ऐसे मामले में उन्हें सम्मान की दुहाई देकर चुप करवा दिया जाता है या उनकी बात को अनदेखा कर दिया जाता है ,खाशकर यौनिक हिंसा ।
 यौनिक हिंसा का सबसे गहरा प्रभाव महिला के मानसिक स्थिति पर पड़ता है ।
      भारतीय परंपरा में शादी के बाद महिलाओं को यह सिखाया जाता है कि अब पति का घर ही उसका घर है और उसकी इच्छा ही सर्वोपरि है ,जिसके कारण अपनी इच्छाओं के विरुद्ध अपने पति द्वारा किये गए बलात्कार को भी न चाहते हुए भी स्वीकार करती है ।
     दहेज उत्पीड़न के कारण उन्हें जलाकर मार दिया जाता है या पूरे जीवन उन्हें अपशब्द ,गालियां ही सुननी पड़ती है ।
      ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ अशिक्षित महिलओं या  जो जागरूक नहीं है उन्ही के साथ हो रहा है ,ऐसा पाया गया है कि बड़े -बड़े ,व अच्छे परिवार से सम्बंधित महिलाओं के साथ मानसिक उत्पीड़न, मारपीट जैसी हिंसा होती है लेकिन पारिवारिक मर्यादा व अन्य कारणों से वह कोई भी प्रतिक्रिया नहीं देती है ।
        ध्यातव्य है कि समाज का परिदृश्य बदल रहा है महिलाएं हर क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना रही है व एक नया मुकाम हासिल कर रही है लेकिन इसकी प्रतिशतता बहुत ही कम है ,आर्थिक रूप में निर्भर महिलाओं का जीवन काफ़ी सुखद स्थिति में आ गयी है परंतु जहाँ बात आती है सम्पूर्ण भारतीय परिदृश्य की तो यह बहुत कम संख्या में है आज भी आधे से ज्यादा आबादी घर में निवास करती है ।
        जब पहली बार किसी स्त्री को अपशब्द बोला जाता है,या किसी तरह के शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना दी जाती है तो वह उसे महज एक दुर्घटना मान लेती कि गुस्से में या गलती से हो गया होगा या वह रिश्तों की मर्यादा समझ कर एक माफी पर सब भूल जाती है आखिर क्यों ?
वही अगला व्यक्ति फिर वही दुहराता है और फिर आपकी माफी सामने वाले को यह भ्रम में डाल देती है कि यह कमजोर है और यह कुछ भी नहीं कर सकती चाहे वह आपकी सहनशीलता है या बच्चों के भविष्य की चिंता ,धीरे-धीरे यह आपकी जिंदगी का सबसे बुरा समय बन जाता है जिससे मानसिक,शारीरिक प्रताड़ना का रूप ले लेती है ,अतः गलती यह है आपकी कि आपने सामने वाले कि पहली गलती माफ कर खुद ही उसे बढ़ावा दिया है ,पहली ही गलती क्यों न हो माफी की कोई गुंजाइश नही होनी चाहिए ।
मजबूरी अगर बनती है तो वह इसलिए क्योंकि आर्थिक कारण सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ।
मानसिक रूप से शसक्त होना पड़ेगा महिलाओं को आपके साथ हो रही हिंसा में कही -न -कही हमारे निर्णय न लेने की क्षमता ही सबसे बड़ी कारण है ,
इसका समाधान यही है कि हम आर्थिक रूप से स्वनिर्भर बनने का पूर्णतः प्रयास करे।
     घरेलू हिंसा किसी न किसी रूप में प्रत्येक दूसरे घर में बनी हुई है चाहे वह मानसिक हो ,मौखिक हो ,शारिरिक हो ,भावनात्मक हो अतः इससे रोकथाम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षा ,जागरूकता ,आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होकर ही किया जा सकता है ,क्योंकि हिंसा करना न करना यह एक मानसिक और नैतिक विचार की उपज है परन्तु कानूनी रूप से जागरूक होना भी इससे बचने में काफी मददगार साबित होना चाहिए।

Tuesday, November 10, 2020

पिंजरे वाली आजादी

वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं ,खुद के ही पिंजरे में,
फड़फड़ाती हूं आजाद होने को,
नही है काफ़ी पढ़ने की आजादी ,
नहीं है काफी लिबास की आजादी ,
नहीं है काफी विचारों की आजादी ,
वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं ,खुद के ही पिंजरे में।
बड़ी पीड़ा सी है अंदर दूर तलक,
आजाद पँछी सा, आसमान में उड़ना चाहती हूं,
देखना चाहती हूं दुनियां को ,
अपनी आंखों से,
जानना चाहती हूं लोगों के अंदर,
बसे खामोश लफ्ज़ो को,
लिखना चाहती हूं ,
अनकहे अल्फाज़ो को,
वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं,खुद के ही पिंजरे में।
ये जो दिखती हूं,वो मैं हूं नहीं,
मेरे अंदर एक जमाना है,
नहीं हूं मैं इतनी गुमशुम सी शांत,
मेरे अंदर भी एक अल्हड़ सा,
खिलखिलाता बच्चा है,
खामोश हो जाती हूं लिहाज से ,
अंदर एक जलता हुआ अंगार सा है,
वक्त ढलता जा रहा ,
मैं कही कैद हूं,खुद के ही पिंजरे में।
रातों के अंधेरो को सवेरा होते देखना चाहती हूं,
अपने अंदर के अंधेरो से रौशनी तक का सफर ,
तय करना चाहती हूं,
अपने अंदर  फड़फड़ाती रूह को ,
उन्मुक्त आकाश में उड़ता देखना चाहती हूं,
बेखौफ हो ,सुकून से चंद लम्हें,
सागर की मचलती लहरों के साथ ,
सूरज को ढलते देखना चाहती हूं,
सागर के गहराइयों में ,मछलियों  के,
आशियानों को छूना चाहती हूं ,
वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं ,खुद के ही पिंजरे में।
पँछी की तरह बेखौफ  आकाश में उड़ना चाहती हूं,
खुद को पिंजरे से आजाद करना चाहती हूं,
खोखले से रिश्तों को ढोना नहीं चाहती हूं,
हां मैं खुद को आजाद करना चाहती हूं,
बेमतलब की बातों से दूर रहना चाहती हूं,
जीना चाहती हूं,उन्मुक्त गगन तलें,
हां, मैं पिंजरा तोड़ उड़ना चाहती हूं।

 महिमा  यथार्थ अभिव्य्यक्ति©


अनकहे अल्फ़ाज .....

Monday, November 9, 2020

सोशल मीडिया : भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति का अनदेखा प्रभाव



जिम्मेदार कौन ,केवल हम सब ,आभासी दुनियां में हम इतने गुम है ,मनोरंजन बेहद पसन्स है चाहे लिबास का हो या जिस्म का लेकिन अपने घर के महिलाओं ,बेटियों को छोड़ कर ,हम  भूल जाते है कि हर कोई महिला किसी न किसी परिवार से जुड़ी  ही हैं यह तो है एक पक्ष ,परंतु इसके दूसरे पहलू पर गौर हम कभी नहीं करते व्यक्तिगत हित के लिए ,कुछ क्षणिक सुख के लिए,
आर्थिक परंतु सरल रास्तों की खोज में,शारीरिक सुख के लिए समझौता कर लेते है और नाम मजबूरी का देते है ।
             आर्थिक रूप से सशक्त होना जीवन में सांस लेने जैसा आवश्यक है सब कुछ स्वतंत्रता में ही निहित है चाहे वह विचारों की स्वतंत्रता हो या अपने ढंग से जीवन जीने के लिए ,किसी की मदद करने के लिए ,जब तक हम किसी के अधीन है तब तक हम अपने ढंग से नहीं जी सकते ,अपनी रुचि के अनुसार काम नहीं कर सकते,  लेकिन केवल जीवनयापन के लिए यह आवश्यक है ,भौतिक व शारीरिक सुख के लिए पैसे की जरूरत है लेकिन मन ,आत्मा की शांति के लिए केवल अच्छे मनोभावों की आवश्यकता है ,न किसी छल की ,न ही किसी दिखावे की ,न ही किसीके समक्ष खुद को दर्शाने की ।
          आज के परिदृश्य में सोशल मीडिया का जो भावनात्मक स्वरूप दृष्टिगोचर हो रहा है वह न सिर्फ मानसिक तनाव के रूप में बल्कि मानवता की क्षीणता ,संस्कृति की क्षीणता ,अपनेपन की क्षीणता, मतभेद के साथ-साथ मनभेद के उतरोत्तर वृद्धि पर है,असमानता ,खुद को दिखाने की पुरजोर कोशिश में हम जो खो रहे है उस पर कभी  ध्यान भी नहीं जाता है।
अपने आप को लोग सिर्फ फॉलोवर्स के नंबर पर,लाइक, कमेंट और साझा करने तक ही समझने लगे है जहाँ धीरे-धीरे यह पारिवारिक अलगाव में वृद्धि कर रहा वही यह खुद से ही खुद के मूल स्वरूप से भी दूर कर रहा है।
             सोशल मीडिया और वास्तविक जीवन लोग कहते तो है अलग है लेकिन इस आभासी दुनियां का पूरा प्रभाव वास्तविक जीवन पर तो भरपूर है ही परंतु विचारों में भी है प्रायः यह देखा जा रहा है कि हम किसी भी तरह के पोस्ट ले ,चाहें वह  यौन  सम्बन्धी हो या किसी महिला के अंगप्रदर्शन से सम्बंधित हो,जाति-पात से ,साम्प्रदायिक  हो व अन्य जो कि संवेदनशील मुद्दे है हम उन्हें चाहते है कि लोग ज्यादा से ज्यादा पसंद करे ,टिप्पणी दे परन्तु जब वही टिप्पणी वास्तविक रूप में सामने होती है तो वह अभद्र टिप्पणी, छेड़खानी,राष्ट्रविरोधी हो जाती है इतना दोहरा विचार ,इतना दोहरा चरित्र समाज में कैसे और क्यों ,यह किस हद तक सही है ?
        यौन शिक्षा लोगों  को लेने में शर्म आती है ,उससे संस्कृति क्षीण होती है लेकिन इसमें शामिल होना या इस तरह के पोस्ट को प्रमोट करना परोक्ष रूप से क्या यह, प्रभावित हमारे वास्तविक जीवन को नहीं करता,जो आभासी दुनियां में बहुत अच्छा है वह जब सच में हो रहा तो गलत क्यों? महिला हो या पुरुष कोई भी अछुता नहीं है इस हो रहे कृत्य से ,प्रश्न खड़े होते तो है विचार सही नहीं है लेकिन इसके पीछे का वास्तविक कारण सब अनदेखा करते जा रहे है ,विचार हमेशा वास्तविक परिदृश्य से बनते है लेकिन हम तो दोनों के बीच भवँर में फंसे है आभासी दुनियां में जो बेहतर है आपकी पहचान मानी जानी है वही वास्तविक जीवन के सच से कोसों दूर है ,कैसे हम सोच सकते है कि लोगों के विचार अच्छे हो समानता आये महिला पुरुष में,विचारों में हो ही नहीं सकता ।सबसे पहले हमें खुद के इर्द गिर्द घूमती इस दुनियां को एक जैसा करना चाहिए ,करते कुछ नहीं कि सही हो लेकिन उम्मीद करते है कि सब लोग के विचार ,भाव ,महिलाओं या पुरुषों के लिए उनकी सोच समान हो ।
           बच्चें के दिमाग पर ,उसके विचार,भाव, लिंग विभेद व अन्य का प्रभाव उसके बचपन में ही पड़ता है ,जो भी बातें हम बचपन में हँस कर ,गलती मानकर अनदेखा करते है उसका प्रत्यक्ष प्रभाव उसके युवा होने की अवस्था में दिखाई देता है ।सुधार की अगर अपेक्षा समाज से की जा रही है तो क्यों वह सुधार स्वयं से या खुद के घर आस -पास के परिदृश्य से ,विद्यालय  व अन्य से नहीं,आखिर क्यों  ?   


महिमा©


22 may CA