Saturday, November 28, 2020

घरेलू हिंसा की एक झलक


 
घरेलू हिंसा जैसा कि शब्द से ही  अर्थ प्रकट होता है कि घर में  होने वाली हिंसा चाहे वह बच्चियों के साथ हो या महिलाओं के साथ। हिंसा विभिन्न प्रकार के हो सकते है जैसे मानसिक ,शारिरिक , यौनिक हिंसा व अन्य ,हिंसा से तात्पर्य है कि कोई भी ऐसा कृत्य जो कि उक्त व्यक्ति की इच्छाओं के विरुद्ध हो रहा है ।
          भारतीय परिदृश्य में परिवार ,समाज ,परम्परा ,रीति रिवाज  को हमेशा से व्यक्ति की इच्छाओं से सर्वोपरि माना जाता है खाशकर जब बात महिलाओं की हो ।
महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में सबसे बड़ा अपराध उनके पतियों और सम्बन्धियों द्वारा किया गया क्रूरता पूर्ण व्यवहार है ।हर एक घंटे में ऐसे 10 मामले दर्ज होते है यह तो रिपोर्ट किये गए आकड़ो का जायजा है लेकिन भारतीय समाज में पारिवारिक व सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला देकर ऐसे मामले अक्सर दर्ज ही नहीं कराए जाते है।छेड़छाड़ ,पतियों द्वारा बलात्कार,दहेज उत्पीड़न ,स्वतंत्रता पूर्व जीवन जीने का अवरोध व अन्य ऐसे मामले है जो लगातार बढ़ते ही जा रहे है ।
             घरेलू हिंसा में महज शारिरिक हिंसा ही नही आता है मानसिक हिंसा जैसे पढ़ने से रोकना ,मर्जी के विरुद्ध शादी तय करना ,अपनी मर्जी के व्यवसाय चयन करने से रोकना,  आवागमन की स्वतंत्रता का न होना ।
मौखिक हिंसा ,भावनात्मक हिंसा ,आर्थिक हिंसा भी घरेलू हिंसा का ही भाग है ।
              आज की स्थिति यह है कि  महिलाओं के अंदर डर और अपनी बात न कह पाने की स्थिति इस कदर बन गयी है कि अपने साथ हुए बर्तावों को वह अपनी मां - बाप से भी नहीं कह पाती है इसका मुख्य कारण यह है कि अक्सर ऐसे मामले में उन्हें सम्मान की दुहाई देकर चुप करवा दिया जाता है या उनकी बात को अनदेखा कर दिया जाता है ,खाशकर यौनिक हिंसा ।
 यौनिक हिंसा का सबसे गहरा प्रभाव महिला के मानसिक स्थिति पर पड़ता है ।
      भारतीय परंपरा में शादी के बाद महिलाओं को यह सिखाया जाता है कि अब पति का घर ही उसका घर है और उसकी इच्छा ही सर्वोपरि है ,जिसके कारण अपनी इच्छाओं के विरुद्ध अपने पति द्वारा किये गए बलात्कार को भी न चाहते हुए भी स्वीकार करती है ।
     दहेज उत्पीड़न के कारण उन्हें जलाकर मार दिया जाता है या पूरे जीवन उन्हें अपशब्द ,गालियां ही सुननी पड़ती है ।
      ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ अशिक्षित महिलओं या  जो जागरूक नहीं है उन्ही के साथ हो रहा है ,ऐसा पाया गया है कि बड़े -बड़े ,व अच्छे परिवार से सम्बंधित महिलाओं के साथ मानसिक उत्पीड़न, मारपीट जैसी हिंसा होती है लेकिन पारिवारिक मर्यादा व अन्य कारणों से वह कोई भी प्रतिक्रिया नहीं देती है ।
        ध्यातव्य है कि समाज का परिदृश्य बदल रहा है महिलाएं हर क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना रही है व एक नया मुकाम हासिल कर रही है लेकिन इसकी प्रतिशतता बहुत ही कम है ,आर्थिक रूप में निर्भर महिलाओं का जीवन काफ़ी सुखद स्थिति में आ गयी है परंतु जहाँ बात आती है सम्पूर्ण भारतीय परिदृश्य की तो यह बहुत कम संख्या में है आज भी आधे से ज्यादा आबादी घर में निवास करती है ।
        जब पहली बार किसी स्त्री को अपशब्द बोला जाता है,या किसी तरह के शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना दी जाती है तो वह उसे महज एक दुर्घटना मान लेती कि गुस्से में या गलती से हो गया होगा या वह रिश्तों की मर्यादा समझ कर एक माफी पर सब भूल जाती है आखिर क्यों ?
वही अगला व्यक्ति फिर वही दुहराता है और फिर आपकी माफी सामने वाले को यह भ्रम में डाल देती है कि यह कमजोर है और यह कुछ भी नहीं कर सकती चाहे वह आपकी सहनशीलता है या बच्चों के भविष्य की चिंता ,धीरे-धीरे यह आपकी जिंदगी का सबसे बुरा समय बन जाता है जिससे मानसिक,शारीरिक प्रताड़ना का रूप ले लेती है ,अतः गलती यह है आपकी कि आपने सामने वाले कि पहली गलती माफ कर खुद ही उसे बढ़ावा दिया है ,पहली ही गलती क्यों न हो माफी की कोई गुंजाइश नही होनी चाहिए ।
मजबूरी अगर बनती है तो वह इसलिए क्योंकि आर्थिक कारण सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ।
मानसिक रूप से शसक्त होना पड़ेगा महिलाओं को आपके साथ हो रही हिंसा में कही -न -कही हमारे निर्णय न लेने की क्षमता ही सबसे बड़ी कारण है ,
इसका समाधान यही है कि हम आर्थिक रूप से स्वनिर्भर बनने का पूर्णतः प्रयास करे।
     घरेलू हिंसा किसी न किसी रूप में प्रत्येक दूसरे घर में बनी हुई है चाहे वह मानसिक हो ,मौखिक हो ,शारिरिक हो ,भावनात्मक हो अतः इससे रोकथाम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षा ,जागरूकता ,आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होकर ही किया जा सकता है ,क्योंकि हिंसा करना न करना यह एक मानसिक और नैतिक विचार की उपज है परन्तु कानूनी रूप से जागरूक होना भी इससे बचने में काफी मददगार साबित होना चाहिए।

Tuesday, November 10, 2020

पिंजरे वाली आजादी

वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं ,खुद के ही पिंजरे में,
फड़फड़ाती हूं आजाद होने को,
नही है काफ़ी पढ़ने की आजादी ,
नहीं है काफी लिबास की आजादी ,
नहीं है काफी विचारों की आजादी ,
वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं ,खुद के ही पिंजरे में।
बड़ी पीड़ा सी है अंदर दूर तलक,
आजाद पँछी सा, आसमान में उड़ना चाहती हूं,
देखना चाहती हूं दुनियां को ,
अपनी आंखों से,
जानना चाहती हूं लोगों के अंदर,
बसे खामोश लफ्ज़ो को,
लिखना चाहती हूं ,
अनकहे अल्फाज़ो को,
वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं,खुद के ही पिंजरे में।
ये जो दिखती हूं,वो मैं हूं नहीं,
मेरे अंदर एक जमाना है,
नहीं हूं मैं इतनी गुमशुम सी शांत,
मेरे अंदर भी एक अल्हड़ सा,
खिलखिलाता बच्चा है,
खामोश हो जाती हूं लिहाज से ,
अंदर एक जलता हुआ अंगार सा है,
वक्त ढलता जा रहा ,
मैं कही कैद हूं,खुद के ही पिंजरे में।
रातों के अंधेरो को सवेरा होते देखना चाहती हूं,
अपने अंदर के अंधेरो से रौशनी तक का सफर ,
तय करना चाहती हूं,
अपने अंदर  फड़फड़ाती रूह को ,
उन्मुक्त आकाश में उड़ता देखना चाहती हूं,
बेखौफ हो ,सुकून से चंद लम्हें,
सागर की मचलती लहरों के साथ ,
सूरज को ढलते देखना चाहती हूं,
सागर के गहराइयों में ,मछलियों  के,
आशियानों को छूना चाहती हूं ,
वक्त ढलता जा रहा है,
मैं कहीं कैद हूं ,खुद के ही पिंजरे में।
पँछी की तरह बेखौफ  आकाश में उड़ना चाहती हूं,
खुद को पिंजरे से आजाद करना चाहती हूं,
खोखले से रिश्तों को ढोना नहीं चाहती हूं,
हां मैं खुद को आजाद करना चाहती हूं,
बेमतलब की बातों से दूर रहना चाहती हूं,
जीना चाहती हूं,उन्मुक्त गगन तलें,
हां, मैं पिंजरा तोड़ उड़ना चाहती हूं।

 महिमा  यथार्थ अभिव्य्यक्ति©


अनकहे अल्फ़ाज .....

Monday, November 9, 2020

सोशल मीडिया : भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति का अनदेखा प्रभाव



जिम्मेदार कौन ,केवल हम सब ,आभासी दुनियां में हम इतने गुम है ,मनोरंजन बेहद पसन्स है चाहे लिबास का हो या जिस्म का लेकिन अपने घर के महिलाओं ,बेटियों को छोड़ कर ,हम  भूल जाते है कि हर कोई महिला किसी न किसी परिवार से जुड़ी  ही हैं यह तो है एक पक्ष ,परंतु इसके दूसरे पहलू पर गौर हम कभी नहीं करते व्यक्तिगत हित के लिए ,कुछ क्षणिक सुख के लिए,
आर्थिक परंतु सरल रास्तों की खोज में,शारीरिक सुख के लिए समझौता कर लेते है और नाम मजबूरी का देते है ।
             आर्थिक रूप से सशक्त होना जीवन में सांस लेने जैसा आवश्यक है सब कुछ स्वतंत्रता में ही निहित है चाहे वह विचारों की स्वतंत्रता हो या अपने ढंग से जीवन जीने के लिए ,किसी की मदद करने के लिए ,जब तक हम किसी के अधीन है तब तक हम अपने ढंग से नहीं जी सकते ,अपनी रुचि के अनुसार काम नहीं कर सकते,  लेकिन केवल जीवनयापन के लिए यह आवश्यक है ,भौतिक व शारीरिक सुख के लिए पैसे की जरूरत है लेकिन मन ,आत्मा की शांति के लिए केवल अच्छे मनोभावों की आवश्यकता है ,न किसी छल की ,न ही किसी दिखावे की ,न ही किसीके समक्ष खुद को दर्शाने की ।
          आज के परिदृश्य में सोशल मीडिया का जो भावनात्मक स्वरूप दृष्टिगोचर हो रहा है वह न सिर्फ मानसिक तनाव के रूप में बल्कि मानवता की क्षीणता ,संस्कृति की क्षीणता ,अपनेपन की क्षीणता, मतभेद के साथ-साथ मनभेद के उतरोत्तर वृद्धि पर है,असमानता ,खुद को दिखाने की पुरजोर कोशिश में हम जो खो रहे है उस पर कभी  ध्यान भी नहीं जाता है।
अपने आप को लोग सिर्फ फॉलोवर्स के नंबर पर,लाइक, कमेंट और साझा करने तक ही समझने लगे है जहाँ धीरे-धीरे यह पारिवारिक अलगाव में वृद्धि कर रहा वही यह खुद से ही खुद के मूल स्वरूप से भी दूर कर रहा है।
             सोशल मीडिया और वास्तविक जीवन लोग कहते तो है अलग है लेकिन इस आभासी दुनियां का पूरा प्रभाव वास्तविक जीवन पर तो भरपूर है ही परंतु विचारों में भी है प्रायः यह देखा जा रहा है कि हम किसी भी तरह के पोस्ट ले ,चाहें वह  यौन  सम्बन्धी हो या किसी महिला के अंगप्रदर्शन से सम्बंधित हो,जाति-पात से ,साम्प्रदायिक  हो व अन्य जो कि संवेदनशील मुद्दे है हम उन्हें चाहते है कि लोग ज्यादा से ज्यादा पसंद करे ,टिप्पणी दे परन्तु जब वही टिप्पणी वास्तविक रूप में सामने होती है तो वह अभद्र टिप्पणी, छेड़खानी,राष्ट्रविरोधी हो जाती है इतना दोहरा विचार ,इतना दोहरा चरित्र समाज में कैसे और क्यों ,यह किस हद तक सही है ?
        यौन शिक्षा लोगों  को लेने में शर्म आती है ,उससे संस्कृति क्षीण होती है लेकिन इसमें शामिल होना या इस तरह के पोस्ट को प्रमोट करना परोक्ष रूप से क्या यह, प्रभावित हमारे वास्तविक जीवन को नहीं करता,जो आभासी दुनियां में बहुत अच्छा है वह जब सच में हो रहा तो गलत क्यों? महिला हो या पुरुष कोई भी अछुता नहीं है इस हो रहे कृत्य से ,प्रश्न खड़े होते तो है विचार सही नहीं है लेकिन इसके पीछे का वास्तविक कारण सब अनदेखा करते जा रहे है ,विचार हमेशा वास्तविक परिदृश्य से बनते है लेकिन हम तो दोनों के बीच भवँर में फंसे है आभासी दुनियां में जो बेहतर है आपकी पहचान मानी जानी है वही वास्तविक जीवन के सच से कोसों दूर है ,कैसे हम सोच सकते है कि लोगों के विचार अच्छे हो समानता आये महिला पुरुष में,विचारों में हो ही नहीं सकता ।सबसे पहले हमें खुद के इर्द गिर्द घूमती इस दुनियां को एक जैसा करना चाहिए ,करते कुछ नहीं कि सही हो लेकिन उम्मीद करते है कि सब लोग के विचार ,भाव ,महिलाओं या पुरुषों के लिए उनकी सोच समान हो ।
           बच्चें के दिमाग पर ,उसके विचार,भाव, लिंग विभेद व अन्य का प्रभाव उसके बचपन में ही पड़ता है ,जो भी बातें हम बचपन में हँस कर ,गलती मानकर अनदेखा करते है उसका प्रत्यक्ष प्रभाव उसके युवा होने की अवस्था में दिखाई देता है ।सुधार की अगर अपेक्षा समाज से की जा रही है तो क्यों वह सुधार स्वयं से या खुद के घर आस -पास के परिदृश्य से ,विद्यालय  व अन्य से नहीं,आखिर क्यों  ?   


महिमा©


Tuesday, October 13, 2020

ख्वाहिशें

ख्वाहिशें

https://youtu.be/bg_kY6JysuY

ख्वाहिशों की लंबी फेहरिस्त रहती होगी ,
उन छोटे -छोटे बच्चों और बच्चियों में जो,
सुबह सुबह कद से भी बड़ा झोला टाँगे ,
फिरते है दर बदर ,
कभी जूठे बोतलों की तलाश में तो कभी छोटे बड़े लोहे की टुकड़ो में तो कभी रद्दी के मोटे दफ़्तियो को ढूंढने में,
 नंगे पांव घूमते है ,
नजर से न देखने योग्य कूड़ो के ढेरों में 
तो कभी बेखौफ से घुसते है ,असुरक्षित जगहों में,
ख्वाहिशों की लंबी फेहरिस्त लिए फिरते है दर- बदर,
कुछ न कर सको तो कम से कम ,
घर मे पड़े बोतलों और डिब्बों को ,
सम्भाल के रख ही दिया करो,
जब घूमते है ये बच्चें तो ,
उस रद्दी के सामानों को सुपुर्द ही कर दिया करो,
नही कहती मैं की उन्हें घर बिठाओ या ,
खाना खिलाओ मगर ,
जितना कर सको आसानी से उतना तो कर ही दो ,
ख्वाहिशों की लंबी फेहरिस्त रहती होगी,
हर एक के मन में।

- महिमा सिंह (यथार्थ अभिव्यक्ति)

Saturday, October 10, 2020

मातृभाषा और के अवनति का आरंभ

  मातृभाषा और मानवता के अवनति का आरंभn 


खामोशी के साथ सब कुछ देखते रहना किस हद तक सही है ?क्या आज तक जितने भी काम किये गए हैं चाहें बात आजादी की हो या अधिकार की या अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की हो किसी न किसी के द्वारा उसकी शुरुआत की गयी है तभी आज हम आजादी,संवैधानिक अधिकारों, सुरक्षा , अभिव्यक्ति ,स्वतंत्रता और गौरवमयी जीवन जी रहे हैं, तो फिर आज हम क्यों लगातार बढ़ती हिंसा,अपराध,बलात्कार,भ्रष्टाचार, एसिड अटैक व अन्य अपराधों के लिए आवाज नहीं  उठाते जब तक कि बात व्यक्तिगत नहीं  हो, आखिर क्यों?
          परिवर्तन अटल सत्य है, लेकिन बिना प्रयत्न के संभव भी नहीं है ,बीते दिनों हिंदी दिवस के अवसर पर लगभग सभी के स्टेटस, सोशल मीडिया, व अन्य जगह काफी सम्मान दिया गया लेकिन विचारणीय है कि क्या यह या इसके पीछे के उद्देश्य यथार्थ रहे है, नहीं ? सामयिक समय की मांग और या यूं कहें तो लोगों की इच्छा नहीं मजबूरी या जरूरत है कि उन्हें अन्य भाषाओं की तरफ अपना आकर्षण रखना ही होगा क्योंकि भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो हिंदी हमारी मातृभाषा है लेकिन मांग नहीं है, जरूरत नहीं पूरी हो सकती है आज भी यहाँ लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण अंचल में निवास करती है ,बच्चों की आधारभूत शिक्षा वहीं से होती है ,अन्य भाषा एक डर भी है और उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी,  कहीं न कहीं ,जितने भी कर्मचारी हैं उन्हें सेवा जिसे देनी है वह आज भी लगभग अन्य भाषा की अपेक्षा मातृभाषा में बेहतर है ।
        बात की जाती है कि अन्य देश जैसा कि जापान ,यूएसए इतनी तरक्की पर क्यों हैं,  उन्होंने अपने तकनीकी शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में अपनी मातृभाषा को अहमियत दी है,मातृभाषा में शिक्षा व्यक्ति को सहज,सृजनात्मक ,साहित्यिक और कल्पनाशील बनाता है। किसी भी देश के लिए शिक्षा,स्वास्थ, तकनीकी विकास ,सूचना प्रौद्योगिकी व अन्य क्षेत्रों में आशातीत विकास की जरूरत है।। 
      भूमण्डलीकरण के कारण आज प्रत्येक देश एक दूसरे से जुड़े हुए हैं,  लेकिन अपनी मातृभाषा और अपनी जनता ,युवा समाज की सृजनात्मक क्षमता  के विकास हेतु व लोगों को कार्यालय से जोड़ने , जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यकता है कि मातृभाषा को ज्यादातर अपनाया जाना चाहिए ।
       हम भारतीयों में एक अलग ही तरह की मानसिकता है या यूं कहें तो लगातार मातृत्व मृत्यु दर,यौन समन्धित बीमारियों, बलात्कार अन्य अपराध कहीं न कहीं कारण है अनवरत लोंगो में घटती सहनशीलता,धैर्य और बढ़ती क्रोध,अहंकार, लालच,कामवासना है ,ज्यादातर पाया गया है कि लोग कामवासना को अपने दिमाग में हर क्षण रखते हैं और अपने काम,अपनी प्राथमिकता को हमेशा द्वितीयक मानते है जबकि पश्चिम के देशों में देखा जा रहा है कि लोग अपने काम ,अपनी प्राथमिकता को दिमाग में रखते है जबकि कामवासना को उसके सही जगह ,जिसके कारण वह लगातार विकास कर रहे हैं ,कुछ नया सृजन कर रहे हैं ,नवाचारी विचार कर रहे है,अनुसंधान कर रहे हैं और समाज व राष्ट्र की सेवा में अग्रणी है ।
              हिंसा ,यौन अपराध ,बलात्कार जैसी घटनाएं लगातार भारत में बढ़ती जा रही है इन क्षणिक सुखों की पूर्ति की इच्छाशक्ति लोगों में इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है कि लोग इसके लिए किसी भी हद तक जाने से पीछे नहीं हट रहे हैं। बार-बार बातें सामने आती है महिलाएं असुरक्षित है इनके साथ यह गलत हुआ ऐसा हुआ यह सत्य तो है कि लेकिन अगर सही ढंग से विचार किया जाय तो सही यह भी है कि जिम्मेदार कहीं न कहीं महिला वर्ग भी है ,कुछ वक्त पहले ही सामने आयी सोशल मीडिया की एक पोस्ट थी और शायद लोगों में मानसिकता भी की एक माँ अपने अंगप्रदर्शन बहुत ही गलत ढंग से कर रही है और फिर बोल रही है कि जब भी भविष्य में मेरे बच्चें देखेंगे तो बोलेंगे की माँ कितनी कमाल की थी ,सही है कि यह व्यक्तिगत सोच हो सकती है लेकिन कहीं न कहीं यह उस सम्पूर्ण वर्ग और भविष्य में भी खतरा है उस वर्ग के साथ ,प्रायः विधवा आश्रम,अनाथालय में उच्च पदों पर महिला वर्ग ही है तो कैसे यह सम्भव हो रहा है कि वहां से लड़कियों की तस्करी,वैश्यावृत्ति व अन्य में महिलाएं जा रही हैं,  हम व्यक्तिगत मानसिकता लोगों की न खत्म कर सकते है न ही बदल सकते है ,स्वार्थसिद्धि ,व्यक्तिगत हित की पूर्ति के लिए सारे अनिष्ट कृत्य किये जा रहे है क्या यह विचारणीय नहीं है ?
                 नियत और नियति में व्याकरण के स्तर से बहुत कम अंतर है परंतु नियति अच्छी है तो ठीक है सब लेकिन अगर नियत अच्छी है तो नियति तो साथ होती ही है और मन मे शांति और संतुष्टि के साथ सेवा का भाव भी है ,नियत ही अच्छी न होने के कारण ही आज लगातार भ्रष्टाचार, असहनशीलता, लोभ ,माया सब बढ़ती ही जा रही है और यह न केवल व्यक्तिगत क्षति है बल्कि यह राष्ट्र की सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक ,सामाजिक क्षति है , विचारणीय है और चिंतनीय विषय भी ।
         गलत,बुरा,या पाप को सहने वाला भी जिम्मेदार है उतना ही जितना कि करने वाला -गीता में स्पष्ट शब्दों में वर्णित है और अटल सत्य भी है ,परिवर्तन और बदलाव संसार का नियम है उसके लिए हमें आवाज उठानी होगी ,मौन रहना अच्छी बात है लेकिन समझदारों का मौन होना बहुत ही गलत बात है वह न सिर्फ आज बर्बाद करेगा बल्कि आने वाले कल को भी प्रभावित करेगा ।
       विचार करें कि क्या यह मानवता के अंत का आरम्भ नहीं हो रहा !



Thursday, October 1, 2020

स्वच्छता की यथार्थता


                "स्वच्छता की यथार्थता"

हमसे प्रकृति नही है प्रकृति है तो हम है ,हमारा अस्तित्व है ,लेकिन वर्तमान समय में लगातार प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा,लगातार वृक्षों की कटाई हो रही ,नदियां गंदी हो रही है ,भूमिगत जल स्तर में लगातार गिरावट हो रही है,साँस सम्बंधित बीमारियां बढ़ रही है,उत्पादन में बढ़ोत्तरी बहुत हुई है लेकिन लगातार उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग से कई बीमारियों की उत्पत्ति हो रही है,मोटरवाहनों के अत्यधिक प्रयोगों से ध्वनियों सम्बंधित समस्याओं का उदय हो रहा है,सब मानवीय कारणों से ही है ।
               देश मे स्वच्छता सम्बन्धित कई योजनाएं चल रही है स्वच्छ भारत मिशन,नमामि गंगे ,पालीथीन मुक्त भारत  आलम यह है कि आज हम बगल में अभियान का संचालन कर रहे है और वही पानी के बोतलों, पान खाकर थूकना,पैक्ड नाश्ता के पालीथीन को वही फेक दे रहे है। रेलवे स्टेशनों पर बोतलों के प्रबन्ध की व्यवस्था है लेकिन शायद वह भी सिर्फ दिखावे के लिए ही रह गया है,पानी के पाउच वाले पालीथीन  हम कही भी फेक देते है क्योंकि हमें थोड़े ही उस स्थान पर रहना है ,लेकिन लोगो को यह बात क्यों समझ मे नही आती है हवाओं में फैली इन गंदगी को किसी सीमा,चेकपोस्ट या देश में बांध कर नही रखा जा सकता है ।
         नदियों को हम भारतीय माता मानते है लेकिन बड़े -बड़े फैक्ट्री ,महानगरों, शहरों,में वहाँ की पूरी गन्दगी को नदियों में ही गिराते है ,जिसमें न जाने कितने  हानिकारक केमिकल नदियों से सागरों तक मिल जाते है जिससे लगातार हमारे जलीय पारितंत्र ,जीवों की विविधता को कम कर दिया है ,न जाने कितने जलीय जीव खत्म होते जा रहे है ,उन्ही केमिकल युक्त जल ,गन्दगी का सेवन जलीय जीव भी करते है जिससे मांसाहारी मनुष्यों में भी अनगिनत बीमारियों में इजाफा हो रहा है । जल का इतना बड़ा भंडार होते हुए भी आज हम पीने के पानी को खरीद कर पी रहे है लेकिन फिर भी लगातार नदियों ,तालाबों, सागरों में गंदगी लगातार बढ़ रही है ,भूमिगत जल स्तर गिरता जा रहा है
                 वृक्षों की कटाई जितनी तेजी से की जा रही है वृक्षारोपण उतना ही कम है ,हम यहाँ कार्यालयी रिपोर्ट की नही यथार्थ की बात कर रहे है वृक्षारोपण किया जा रहा है लेकिन वह भी सिर्फ दिखावा रह गया है आधारभूत स्तर पर देखा जाय तो इसे चाहे पेशेवर व्यक्ति हो या अधिकारी वर्ग एक काम समझकर उस वक्त पूरा करता है वृक्ष लगा या नही इससे कोई ताल्लुकात नही है ।
        आज हम अपने घर के कूड़ो को निकाल कर घर साफ कर ले रहे है लेकिन वही कूड़ा घर के बगल में फेंक दी रहे है क्या उस कूड़े से मिश्रित हवाओं को ,हानिकारक गैसों को हम अपने घर मे आने से रोक सकते है । कूड़ा घर में हो तो जिम्मेदारी आपकी लेकिन आपके बगल में आपने फेक दिया तो जिम्मेदारी नगरपालिका की ,सरकार की है ।हम अपने स्वास्थ्य ,पर्यावरण के लिए सबसे पहले स्वंय जिम्मेदार है।
                         पालीथीन मुक्त भारत योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया लेकिन कुछ वक्त तक ही जबकि आज जो मानक रखे गए थे पॉलीथिन के लिए आज उसका कोई महत्व नही है सब कुछ खत्म क्या प्रकृति की रक्षा और स्वच्छता के दायित्वों का निर्वहन केवल बड़े -बड़े समारोहों,सोशलमीडिया के चंद पोस्ट तक ही सीमित है क्या यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नही है । क्या हम सांसे लेना या भोजन कुछ भी छोड़ते है नही लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाले गन्दगी को हम मानते है कि हमे बाहर थोड़े ही रहना है हमे तो अपने घर में रहना है जब तक कि यह धारणा बनी रहेगी लगातार पर्यावरणीय असन्तुलन बना रहेगा ।
                     अगर एक स्वच्छ वातावरण में जीना है तो व्यक्तिगत, सामाजिक, औद्योगिक अन्य स्तर पर अपने मौलिक कर्तव्यों का निर्वहन और प्रकृति के लिए अपने समर्पण के साथ हमें स्वच्छता हेतु जागरूक होना होगा ।


महिमा सिंह (यथार्थ अभिव्यक्ति)

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22 may CA