Tuesday, October 13, 2020

ख्वाहिशें

ख्वाहिशें

https://youtu.be/bg_kY6JysuY

ख्वाहिशों की लंबी फेहरिस्त रहती होगी ,
उन छोटे -छोटे बच्चों और बच्चियों में जो,
सुबह सुबह कद से भी बड़ा झोला टाँगे ,
फिरते है दर बदर ,
कभी जूठे बोतलों की तलाश में तो कभी छोटे बड़े लोहे की टुकड़ो में तो कभी रद्दी के मोटे दफ़्तियो को ढूंढने में,
 नंगे पांव घूमते है ,
नजर से न देखने योग्य कूड़ो के ढेरों में 
तो कभी बेखौफ से घुसते है ,असुरक्षित जगहों में,
ख्वाहिशों की लंबी फेहरिस्त लिए फिरते है दर- बदर,
कुछ न कर सको तो कम से कम ,
घर मे पड़े बोतलों और डिब्बों को ,
सम्भाल के रख ही दिया करो,
जब घूमते है ये बच्चें तो ,
उस रद्दी के सामानों को सुपुर्द ही कर दिया करो,
नही कहती मैं की उन्हें घर बिठाओ या ,
खाना खिलाओ मगर ,
जितना कर सको आसानी से उतना तो कर ही दो ,
ख्वाहिशों की लंबी फेहरिस्त रहती होगी,
हर एक के मन में।

- महिमा सिंह (यथार्थ अभिव्यक्ति)

Saturday, October 10, 2020

मातृभाषा और के अवनति का आरंभ

  मातृभाषा और मानवता के अवनति का आरंभn 


खामोशी के साथ सब कुछ देखते रहना किस हद तक सही है ?क्या आज तक जितने भी काम किये गए हैं चाहें बात आजादी की हो या अधिकार की या अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की हो किसी न किसी के द्वारा उसकी शुरुआत की गयी है तभी आज हम आजादी,संवैधानिक अधिकारों, सुरक्षा , अभिव्यक्ति ,स्वतंत्रता और गौरवमयी जीवन जी रहे हैं, तो फिर आज हम क्यों लगातार बढ़ती हिंसा,अपराध,बलात्कार,भ्रष्टाचार, एसिड अटैक व अन्य अपराधों के लिए आवाज नहीं  उठाते जब तक कि बात व्यक्तिगत नहीं  हो, आखिर क्यों?
          परिवर्तन अटल सत्य है, लेकिन बिना प्रयत्न के संभव भी नहीं है ,बीते दिनों हिंदी दिवस के अवसर पर लगभग सभी के स्टेटस, सोशल मीडिया, व अन्य जगह काफी सम्मान दिया गया लेकिन विचारणीय है कि क्या यह या इसके पीछे के उद्देश्य यथार्थ रहे है, नहीं ? सामयिक समय की मांग और या यूं कहें तो लोगों की इच्छा नहीं मजबूरी या जरूरत है कि उन्हें अन्य भाषाओं की तरफ अपना आकर्षण रखना ही होगा क्योंकि भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो हिंदी हमारी मातृभाषा है लेकिन मांग नहीं है, जरूरत नहीं पूरी हो सकती है आज भी यहाँ लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण अंचल में निवास करती है ,बच्चों की आधारभूत शिक्षा वहीं से होती है ,अन्य भाषा एक डर भी है और उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी,  कहीं न कहीं ,जितने भी कर्मचारी हैं उन्हें सेवा जिसे देनी है वह आज भी लगभग अन्य भाषा की अपेक्षा मातृभाषा में बेहतर है ।
        बात की जाती है कि अन्य देश जैसा कि जापान ,यूएसए इतनी तरक्की पर क्यों हैं,  उन्होंने अपने तकनीकी शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में अपनी मातृभाषा को अहमियत दी है,मातृभाषा में शिक्षा व्यक्ति को सहज,सृजनात्मक ,साहित्यिक और कल्पनाशील बनाता है। किसी भी देश के लिए शिक्षा,स्वास्थ, तकनीकी विकास ,सूचना प्रौद्योगिकी व अन्य क्षेत्रों में आशातीत विकास की जरूरत है।। 
      भूमण्डलीकरण के कारण आज प्रत्येक देश एक दूसरे से जुड़े हुए हैं,  लेकिन अपनी मातृभाषा और अपनी जनता ,युवा समाज की सृजनात्मक क्षमता  के विकास हेतु व लोगों को कार्यालय से जोड़ने , जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यकता है कि मातृभाषा को ज्यादातर अपनाया जाना चाहिए ।
       हम भारतीयों में एक अलग ही तरह की मानसिकता है या यूं कहें तो लगातार मातृत्व मृत्यु दर,यौन समन्धित बीमारियों, बलात्कार अन्य अपराध कहीं न कहीं कारण है अनवरत लोंगो में घटती सहनशीलता,धैर्य और बढ़ती क्रोध,अहंकार, लालच,कामवासना है ,ज्यादातर पाया गया है कि लोग कामवासना को अपने दिमाग में हर क्षण रखते हैं और अपने काम,अपनी प्राथमिकता को हमेशा द्वितीयक मानते है जबकि पश्चिम के देशों में देखा जा रहा है कि लोग अपने काम ,अपनी प्राथमिकता को दिमाग में रखते है जबकि कामवासना को उसके सही जगह ,जिसके कारण वह लगातार विकास कर रहे हैं ,कुछ नया सृजन कर रहे हैं ,नवाचारी विचार कर रहे है,अनुसंधान कर रहे हैं और समाज व राष्ट्र की सेवा में अग्रणी है ।
              हिंसा ,यौन अपराध ,बलात्कार जैसी घटनाएं लगातार भारत में बढ़ती जा रही है इन क्षणिक सुखों की पूर्ति की इच्छाशक्ति लोगों में इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है कि लोग इसके लिए किसी भी हद तक जाने से पीछे नहीं हट रहे हैं। बार-बार बातें सामने आती है महिलाएं असुरक्षित है इनके साथ यह गलत हुआ ऐसा हुआ यह सत्य तो है कि लेकिन अगर सही ढंग से विचार किया जाय तो सही यह भी है कि जिम्मेदार कहीं न कहीं महिला वर्ग भी है ,कुछ वक्त पहले ही सामने आयी सोशल मीडिया की एक पोस्ट थी और शायद लोगों में मानसिकता भी की एक माँ अपने अंगप्रदर्शन बहुत ही गलत ढंग से कर रही है और फिर बोल रही है कि जब भी भविष्य में मेरे बच्चें देखेंगे तो बोलेंगे की माँ कितनी कमाल की थी ,सही है कि यह व्यक्तिगत सोच हो सकती है लेकिन कहीं न कहीं यह उस सम्पूर्ण वर्ग और भविष्य में भी खतरा है उस वर्ग के साथ ,प्रायः विधवा आश्रम,अनाथालय में उच्च पदों पर महिला वर्ग ही है तो कैसे यह सम्भव हो रहा है कि वहां से लड़कियों की तस्करी,वैश्यावृत्ति व अन्य में महिलाएं जा रही हैं,  हम व्यक्तिगत मानसिकता लोगों की न खत्म कर सकते है न ही बदल सकते है ,स्वार्थसिद्धि ,व्यक्तिगत हित की पूर्ति के लिए सारे अनिष्ट कृत्य किये जा रहे है क्या यह विचारणीय नहीं है ?
                 नियत और नियति में व्याकरण के स्तर से बहुत कम अंतर है परंतु नियति अच्छी है तो ठीक है सब लेकिन अगर नियत अच्छी है तो नियति तो साथ होती ही है और मन मे शांति और संतुष्टि के साथ सेवा का भाव भी है ,नियत ही अच्छी न होने के कारण ही आज लगातार भ्रष्टाचार, असहनशीलता, लोभ ,माया सब बढ़ती ही जा रही है और यह न केवल व्यक्तिगत क्षति है बल्कि यह राष्ट्र की सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक ,सामाजिक क्षति है , विचारणीय है और चिंतनीय विषय भी ।
         गलत,बुरा,या पाप को सहने वाला भी जिम्मेदार है उतना ही जितना कि करने वाला -गीता में स्पष्ट शब्दों में वर्णित है और अटल सत्य भी है ,परिवर्तन और बदलाव संसार का नियम है उसके लिए हमें आवाज उठानी होगी ,मौन रहना अच्छी बात है लेकिन समझदारों का मौन होना बहुत ही गलत बात है वह न सिर्फ आज बर्बाद करेगा बल्कि आने वाले कल को भी प्रभावित करेगा ।
       विचार करें कि क्या यह मानवता के अंत का आरम्भ नहीं हो रहा !



Thursday, October 1, 2020

स्वच्छता की यथार्थता


                "स्वच्छता की यथार्थता"

हमसे प्रकृति नही है प्रकृति है तो हम है ,हमारा अस्तित्व है ,लेकिन वर्तमान समय में लगातार प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा,लगातार वृक्षों की कटाई हो रही ,नदियां गंदी हो रही है ,भूमिगत जल स्तर में लगातार गिरावट हो रही है,साँस सम्बंधित बीमारियां बढ़ रही है,उत्पादन में बढ़ोत्तरी बहुत हुई है लेकिन लगातार उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग से कई बीमारियों की उत्पत्ति हो रही है,मोटरवाहनों के अत्यधिक प्रयोगों से ध्वनियों सम्बंधित समस्याओं का उदय हो रहा है,सब मानवीय कारणों से ही है ।
               देश मे स्वच्छता सम्बन्धित कई योजनाएं चल रही है स्वच्छ भारत मिशन,नमामि गंगे ,पालीथीन मुक्त भारत  आलम यह है कि आज हम बगल में अभियान का संचालन कर रहे है और वही पानी के बोतलों, पान खाकर थूकना,पैक्ड नाश्ता के पालीथीन को वही फेक दे रहे है। रेलवे स्टेशनों पर बोतलों के प्रबन्ध की व्यवस्था है लेकिन शायद वह भी सिर्फ दिखावे के लिए ही रह गया है,पानी के पाउच वाले पालीथीन  हम कही भी फेक देते है क्योंकि हमें थोड़े ही उस स्थान पर रहना है ,लेकिन लोगो को यह बात क्यों समझ मे नही आती है हवाओं में फैली इन गंदगी को किसी सीमा,चेकपोस्ट या देश में बांध कर नही रखा जा सकता है ।
         नदियों को हम भारतीय माता मानते है लेकिन बड़े -बड़े फैक्ट्री ,महानगरों, शहरों,में वहाँ की पूरी गन्दगी को नदियों में ही गिराते है ,जिसमें न जाने कितने  हानिकारक केमिकल नदियों से सागरों तक मिल जाते है जिससे लगातार हमारे जलीय पारितंत्र ,जीवों की विविधता को कम कर दिया है ,न जाने कितने जलीय जीव खत्म होते जा रहे है ,उन्ही केमिकल युक्त जल ,गन्दगी का सेवन जलीय जीव भी करते है जिससे मांसाहारी मनुष्यों में भी अनगिनत बीमारियों में इजाफा हो रहा है । जल का इतना बड़ा भंडार होते हुए भी आज हम पीने के पानी को खरीद कर पी रहे है लेकिन फिर भी लगातार नदियों ,तालाबों, सागरों में गंदगी लगातार बढ़ रही है ,भूमिगत जल स्तर गिरता जा रहा है
                 वृक्षों की कटाई जितनी तेजी से की जा रही है वृक्षारोपण उतना ही कम है ,हम यहाँ कार्यालयी रिपोर्ट की नही यथार्थ की बात कर रहे है वृक्षारोपण किया जा रहा है लेकिन वह भी सिर्फ दिखावा रह गया है आधारभूत स्तर पर देखा जाय तो इसे चाहे पेशेवर व्यक्ति हो या अधिकारी वर्ग एक काम समझकर उस वक्त पूरा करता है वृक्ष लगा या नही इससे कोई ताल्लुकात नही है ।
        आज हम अपने घर के कूड़ो को निकाल कर घर साफ कर ले रहे है लेकिन वही कूड़ा घर के बगल में फेंक दी रहे है क्या उस कूड़े से मिश्रित हवाओं को ,हानिकारक गैसों को हम अपने घर मे आने से रोक सकते है । कूड़ा घर में हो तो जिम्मेदारी आपकी लेकिन आपके बगल में आपने फेक दिया तो जिम्मेदारी नगरपालिका की ,सरकार की है ।हम अपने स्वास्थ्य ,पर्यावरण के लिए सबसे पहले स्वंय जिम्मेदार है।
                         पालीथीन मुक्त भारत योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया लेकिन कुछ वक्त तक ही जबकि आज जो मानक रखे गए थे पॉलीथिन के लिए आज उसका कोई महत्व नही है सब कुछ खत्म क्या प्रकृति की रक्षा और स्वच्छता के दायित्वों का निर्वहन केवल बड़े -बड़े समारोहों,सोशलमीडिया के चंद पोस्ट तक ही सीमित है क्या यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नही है । क्या हम सांसे लेना या भोजन कुछ भी छोड़ते है नही लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाले गन्दगी को हम मानते है कि हमे बाहर थोड़े ही रहना है हमे तो अपने घर में रहना है जब तक कि यह धारणा बनी रहेगी लगातार पर्यावरणीय असन्तुलन बना रहेगा ।
                     अगर एक स्वच्छ वातावरण में जीना है तो व्यक्तिगत, सामाजिक, औद्योगिक अन्य स्तर पर अपने मौलिक कर्तव्यों का निर्वहन और प्रकृति के लिए अपने समर्पण के साथ हमें स्वच्छता हेतु जागरूक होना होगा ।


महिमा सिंह (यथार्थ अभिव्यक्ति)

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Saturday, September 26, 2020

जिम्मेदार मैं

अपने हार की जिम्मेदार मैं,
अपने जीत की हक़दार मैं,
अपने उदासी का कारण मैं,
अपने कमजोरी का कारण मैं,
अपने एहसास की वजह मैं,
अपने खामोशी की वजह मैं,
अपने विचारो की जिम्मेदार मैं,
अपने गुस्से की वजह मैं,
लोग मुझे क्या कहे इसकी जिम्मेदार मैं,
मुझे कौन तकलीफ दे वजह मैं,
मैंने किसे बोलने का हक दिया खुद के बारे में जिम्मेदार मैं,
मेरे रोने की वजह मैं,
अपने भाग्य की निर्माता मैं,
स्वाभिमान की रक्षक मैं,
ईर्ष्या,घृणा, निंदा नही करना निर्णय मेरा ,
सहनशीलता की हद तय करने की जिम्मेदारी मेरी,
जीवन मेरा,
अबला में ही बल निहित है, पहचानना मेरा कर्तव्य
किस्मत पर बस नही,
जिम्मेदार नही हूँ तो इसकी की,
मैं लड़की हूँ,
मुझे अबला कहा जाता है,
विरोध करना ,मर्यादा तोड़ना माना जाता है,
प्रेम करना पाप माना जाता है,
उच्च कुल नही तो जिम्मेदार नही,
स्त्री का मतलब पारिवारिक इज्जत का बोझ ढोना,
क्या सिर्फ स्त्री मात्र जिम्मेदार है ?
सिमटते सपनो को देखा है मैने उन 
आँखों जब लौट के घर को जाती हूँ,
स्त्री तू महान है ,,, यह समाज एक मजबूत स्त्री को 
अक्सर बुरी नजर से देखता है 
क्योंकि उसे नियंत्रित नही कर पाता ,
समय-समय पर चरितार्थ भी हुयी है ,
तू चल संघर्षों के मैदान में  ,
अकेले सफर को तैयार हो जा,
अगर यह जिंदगी तेरी है तो ,
भाव को अपना सबसे बड़ा पथप्रदर्शक बना,,
बाकी समय चलता रहेगा अपना काम वक्त करता रहेगा।

- महिमा सिंह (यथार्थ अभिव्यक्ति)

यथार्थ प्रेम-आज का परिदृश्य



संसार का स्थायित्व इसलिए है क्योंकि प्रेम,भावना,आचरण,मानवता,सेवा ,समर्पण ,संस्कृति का स्थायित्व है केवल इसके रूप बदलते है अन्यथा इस दुनियां सब कुछ अस्थायी है,परिवर्तनशील है ।प्रेम की परिभाषा में नाम लिया जाता है राधा और कृष्ण का 
,कृष्ण और सुदामा का ,शिव जी और माँ आदिशक्ति का,मीरा और कृष्ण का,भक्त और भगवान का,माँ की भावनाओं का ,पिता के प्रेम का ।
      जहां तक कि मनुष्यों की बात की जाए तो जीवन के आरम्भ में तो कभी कोई जाति,वर्ग,लिंग असमानता,स्तर,देश,विदेश,राज्य ,धर्म (हिन्दू,मुसलिम, सिख,ईसाई ,प्रोटेस्टेंट अन्य) , गोरा,काला, अमीर ,गरीब जैसी कोई अवधारणा या अलगाव नही था ।जैसे जैसे हमने विकास करना आरम्भ किया ,एक संस्कृति विकसित होने की प्रकिया का उदघोष हुआ अपनत्व नही अपने की भावना का विकास होने लगा,अपने लिए भोजन,पानी,आवास ,संसाधन इकट्ठा करना ,अपनी उत्तरजीविता को बचाएं रखने की होड़ हुई तभी से स्वार्थ और वर्ग संघर्ष का बीज प्रस्फुटित हुआ और धीरे-धीरे यह दायरा इतना बढ़ता चला गया कि फिर अपना परिवार,अपना वर्ग ,अपनी जाति, अपना धर्म, अपना समुदाय , अपना राष्ट्र, अपना देश स्वअस्तित्व की इतनी गहरी खाई बन गयी कि आज मानवता,धर्म,सेवा ,प्रेम सब बिल्कुल निरीह,निर्जीव और शब्द मात्र बन कर रह गया है ।
     आज वर्तमान समय में सेवा ,दान ,धर्म(कर्म) सब स्वार्थ की कसौटी पर तौली जाती है ,आज सेवा ,दान एक भाव नही दिखावा बन गया है ,किसी को जरा सा भोजन क्या दे दिया फ़ोटो ली और सोशल कर दिया आप सच में दिखाना चाहते है कि आपने किया ,सच्ची भावना को कभी दिखाने की जरूरत होती है क्या ? 
     आज से पहले स्वामी विवेकानंद, विद्याचंद सागर,अब्दुल कलाम ,नेल्सन मंडेला व अन्य लोगों ने जो किया व उनकी सच्ची  भावना थी जो कि उनके व्यक्तित्व में थी आज उसे इसलिए नही पढ़ा जाता कि आप यह विचार करें कि लोग सोचते थे महसूस करते थे कि मानवता के लिए यह किया जाना चाहिए ,मानवता ही सच्ची सेवा है वे कभी भी अपने राष्ट्र ,जाति, धर्म में न बंधकर सम्पूर्ण विश्व को अपना मान कर काम किये ,उनके लिए सम्पूर्ण मानवजाति की सेवा ही धर्म थी,अन्याय ,द्वेष,ईर्ष्या, भेदभाव ,दिखावें से परे उनके लिए सिर्फ मानवता ही सर्वश्रेष्ठ धर्म और कर्म रहा ।
      जाति, वर्ग,लिंग भेद,असमानता, सब अपने आपको सर्वश्रेष्ठ ,उच्च बनाने के लिए किया गया एक स्वार्थपरक विचार है यदि आप सच में मजबूत है तो इस प्रकार के स्वार्थपरक विचारों की आवश्यकता ही क्यों ?
आप श्रेष्ठ खुद को कैसे मान सकते है जबकि आप खुद जानते है कि इस संसार का अस्तिव और प्रारम्भ आपका जीवन व सब कुछ सिर्फ एक श्रेष्ठ हाथों में है।
     वर्तमान समय की स्थिति यह है कि जब जान की बात आ जाए तो सवर्ण वर्ग सिर्फ उस आवश्यक वर्ग के खून की खोज करता है न कि अपने जाति या वर्ग के व्यक्ति के रक्त का, रेस्टोरेंट में जाने पर भोजन बनाने वाले के जाति का ब्यौरा नही लेता बल्कि स्वाद का हाल जानता है वही घर पर काम करने वाली के बारे में जांच पड़ताल होती है,बाहर आप बोल देते हो कि कोई काम धंधा नही कर पाती और खुद कोई काम नही देना चाहता ,अपनी सर्वोच्चता के लिए लोगों की मदद तो करता है लेकिन एक उम्मीद साथ में लगी होती है । 
     प्रेम सिर्फ भाव और एहसास है वह किसी के लिए हो सकती है,किसी भी उम्र से हो सकती है,किसी जानवर से हो सकती है ,वृद्ध से हो सकती है ,इस विश्व मे ऐसा कौन है जो प्रेम की भावना को महसूस नही कर सकता है ,स्पर्श व अहसास ,भाव से दो अंजान व्यक्ति ,कोई जानवर आपसे प्रेम करने लगता है ,भाव ही है जो लोग को जोड़ देता है जरूरी नही है कि हर प्यार का मतलब शरीर का मिलना है शरीर तो बस आकर्षण है प्रेम नही ,सच में प्रेम जो है मन ,व्यवहार ,आपके शब्द ,आपके सम्मान से निःस्वार्थ होना चाहिए ।
आज का सबसे कड़वा सच जो कि युवा वर्ग या सम्बन्धित लोगों में प्रकट हो रहा है वह यह है कि लोंगो में भाव का स्थायित्व ही नही है ,हर कोई प्रेम का मतलब तक नही जानता झूठे वादे,दिखावा,कसम ,मरना-जीना लगा रखा है ,उसकी अंतिम ईच्छा शरीर का मिलना ही मानते है उसके बाद की सच्चाई से सब रूबरू है ,आज का व्यक्ति इतना स्वार्थी है कि आप सब कुछ लुटा कर किसी से प्रेम करिए तो कुछ वक्त के बाद चरित्रहीन है आप लोगों से बात करते है तो आपका यह पेशा है अतः सम्पूर्ण समर्पण सिर्फ ईश्वर के सामने ही किया जा सकता है जहाँ आपको अपने सम्मान की चिंता नही करनी है ,धन ,दौलत ,अहंकार सब खत्म हो जाता है लेकिन मनुष्य के सामने हमेशा आपको अपने व्यक्तित्व, अपने सम्मान, अपने अभिवृत्ति से यदि समझौता या उसके सामने झुकना पड़े तो वह प्रेम हो ही नही सकता ।
   लोग वीआईपी की अलग लाइन में लग कर मंदिरो में दर्शन को जाते है क्या वह ईश्वर के सामने अपना वैभव प्रदर्शन में जाते है या लोगों को दिखाने के लिए ऐसा करते है ?जिस ईश्वर ने इस संसार को बनाया है आप उसके सामने अपने को क्या साबित करना चाहते है?
      प्रेम तो गुस्से ,नाराजगी,खामोशी हर रूप में लेकिन शर्त यह है कि समझने वाले इंसान नही है क्योंकि लोग प्रेम को भी दिखावें का पर्याय मानने लगे है ,समाज में लोगो की मदद बहुत से लोग अपने अपने तरीकों से करते रहते है लेकिन उन्हें किसी के प्रशंसा की कोई आवश्यकता नही होती है वह है भाव । 
                  प्रेम ही इस संसार को बचाएं हुए है मानवता ,दया ,सेवा ,धर्म सभी प्रेम के ही रूप है लेकिन भावनाओं का सच होने आवश्यक है सच क्या ?सच ,उचित का मानदंड क्या है यही न कि किसी का अहित न हो ,किसी को आपके कारण रत्ती भर कष्ट न मिले ,किसी का नुकसान न हो ,कोई बच्चा आपकी योग्यता है फिर भी वह आपके सामने भूखा, नँगा,या फिर वस्त्र न होने पर कड़कड़ाते हुए है तो आप मे भावना है ही नही । 
        प्रेम के कई रूप है प्रेम आपके मन में है कि जब आप देख रहे हो कि छोटे बच्चें कद से भी लंबे झोले लिए कूड़े बीनते हो,वस्त्र न होने पर ठंड से कांप रहे हो बच्चे ,वृद्ध आराम करने की उम्र में घर से बेदखल कर दिए गए हो यह सब देख कर आपका हृदय रो पड़े,आप मदद करे वह है प्रेम ......
       अगर आपके अंदर प्रेम है तो आप कभी किसी से नफरत नही कर सकते है ...
     प्रेम सिर्फ प्रेम की भाषा सुनता है न की अन्य ............
   प्रेम और सम्मान एक दूसरे के पूरक है ।

महिमा यथार्थ ©

22 may CA