Monday, November 14, 2022

रिक्तता

रिक्तता

मैंने अपने जीवन में महसूस किया है कि हम जैसे -जैसे बड़े होते है खुद को एक दायरे में बांधते चले जाते है मेरा दायरा कहने का तात्पर्य है कि खुद को किसी एक ही भावना,एक ही व्यक्ति,एक ही काम व अन्य में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते है और फिर अमूक काम,भाव ,व्यक्ति से हम दूर होते है या असफ़ल होते है तो हम पूरी तरह खुद को रिक्तता /खालीपन से घिरा हुआ पाते है।
         मैं जिंदगी को जीने में ज्यादा यक़ीन करती हूं खुद को सीमित करने के बजाय ,मुझे याद मैंने कहीं स्वामी विवेकानंद जी की एक लाइन पढ़ी थी कि "जिस वक्त आप जो कर रहे है उस वक्त आपका मन,आत्मा ,दिमाग पूरी तरह उस समय में होना चाहिए ।"चाहे वह काम हो,पढ़ाई हो,सृजनात्मक काम हो,खेल हो या अन्य।
हम एक दिन में बहुत से काम करते है कुछ एक -दो परिस्थितियों को छोड़ देते है तो हम लगभग काम पूरे मनोयोग से कर सकते है।
           मैंने जब भी खुद को एक केंद्रित काम,भाव व अन्य के लिए सर्वस्व छोड़ा है मैंने सफलता या असफलता के बाद अपने अंदर रिक्तता को पाया है और जब जब मैंने अपने आप को प्रकृति,मानवता, स्वास्थ्य,व्यवसाय , भाव व अन्य को एक साथ अलग -अलग जीया और महसूस किया है मैंने स्वयं को भरा हुआ पाया है।
             हम प्रेम की तलाश को केवल जब एक व्यक्ति के रूप में देखते है तो हम रिक्तता को अवश्य महसूस करेंगे ,प्रेम तो खुद का ख्याल रखने से लेकर  प्रकृति से प्रेम, विकास, स्नेह ,लोगों की मदद उनकी मुस्कुराहट ,दोस्तों की हँसी, अध्यात्म  सब कुछ में प्रेम ही है बस महससू करना है,अपनी रिक्तता का जिम्मेदार आप खुद होते है क्योंकि आप अपनी खुशियां केवल केंद्रित भाव से देखते है किसी एक लक्ष्य, एक व्यक्ति ,एक काम व अन्य  की पूर्णता में।
              अपने आप को खुद से जोड़े सबसे पहले फिर प्रकृति ,काम ,अभ्यास ,अध्यात्म फिर इन सब को साथ लेते हुए किसी से समर्पण रखेंगे तो कभी भी रिक्तता महसूस नहीं करेंगे क्योंकि तब सारे भावों का सम्मिश्रण आपको फिर से भर देगा । यह अनुभव है जीवन के एक पहलू का।

Sunday, September 25, 2022

मात्र नौ दिन

✍️मात्र नौ दिन ✍️
Don't copy please 

बधाई हो,
आप  आज से मात्र नौ दिन की देवी है ,
हर वर्ष आपके लिए यह शुभ दिन ,
आता है,आया है,आता रहेगा !

न न ज्यादा खुश मत हो जाना ,
शेष दिन वर्ष भर रहेगा और 
तब तुम तेज बोलोगी तो मुखर नहीं,
बेशर्म ,संस्कार हीन,समझ ली जाओगी!

आपका  बेबाक और मनमुताबित काम को,
बेफजूल,नारीवादी मानसिकता,बेपरवाह
समझ लिया जाएगा ,ज्यादा खुश मत होना,
आपका सौंदर्य,रूप,किसी के नजरों में
हवस भर देगा ,चिंता मत करो,
 अपारदर्शी ,संपूर्ण, कपड़े नहीं पहनी होगी न,
इसलिए गलती आपकी होगी !

आपको प्यार में अपशब्द बोला जा सकता है,
यह तो चलता आया है तुम पलट के जवाब दोगी,
अरे! मर्यादा और संस्कार भूल गई हो क्या ,
गृहस्थी बचाने की जिम्मेदारी मात्र आपकी है न,
सहना सीख लो, हमने भी तो किया है न!

बधाई हो तुम मात्र नौ दिन की देवी हो,
बात नहीं मानोगी न तो मार दी जाओगी,
जला दी जाओगी,चेहरा खराब कर दिया जायेगा,
मना मत करना अगर जिंदा रहना है, मर –मर के,
घुट –घुट के जी लेना कम से कम सांसे चलेंगी!

बधाई हो! आवाज तो उठाओ आप,
नारीवादी मानसिकता वाली पदवी मिलेगी,
तुम मुखर हो,प्रखर हो,बेबाक हो,
आत्मसम्मान है तुम्हारा सब भुला दिया जाएगा!
Mahima Singh©

Monday, September 19, 2022

✍️चरित्र चित्रण एक अभिशाप



✍️चरित्र चित्रण एक अभिशाप ✍️

पुरुष ज्यादा चरित्रवान इसलिए भी है कि,
स्त्रियां ज्यादा मर्यादित और सामाजिक डर में
भी जीती है ज्यादातर,
अक्सर पुरुषों के चरित्र का प्रमाणपत्र किसी न किसी
स्त्री के जीवन में समाया है या इनबॉक्स में पड़ा है,
स्त्रियां बैठक लगा किसी पुरुष का चरित्र चित्रण नहीं
करती अक्सर,
पुरुष ज्यादा चरित्रवान इसलिए भी है इस समाज में!

स्त्रियां अक्सर इस समाज में चरित्रहीन मान ली जाती है क्योंकि लोगों को अपनी व्यक्तिगत बातों को सार्वजनिक करने का शाश्वत अधिकार जो प्राप्त मान
लिया जाता है ,
अक्सर स्त्री के बारे में बैठक लगा चार लोग चरित्र 
चित्रित करते है,
अक्सर उनका मना करना उनके जान पर बन आती है, वह एसिड अटैक की शिकार हो जाती है,
स्त्रियां के बारे कोई भी बात बिना प्रमाण के मान भी ली जाती है अक्सर,
स्त्रियां इसलिए भी समाज में चरित्रहीन मान ली जाती है!

अक्सर कुछ लोगों की गलतियों को पूर्वाग्रह मानकर भी लोग एक दूसरे का चरित्र चित्रित करने लग जाते है,
क्या यह सही है ?किसी के लिए भी?

नारीवादी समाज की अपेक्षा नही है , न पुरुषवादी समाज की है हमें , कम से कम समानता,सम्मान मांगनी न पड़े ,ऐसा मानवतावादी समाज ,व्यवहार लोगों में होना ही चाहिए ।महिमा यथार्थ ©

Monday, July 25, 2022

विधवा

लंबे अर्से से बीमारियों से जूझते देख रही वो,
एक उम्मीद का दिया जलाएं खुशी से जीए जा रही वो,
अचानक मिज़ाज ए तबियत बिगड़ने लगी और,
अस्पताल की दौड़ के आरम्भ के साथ ,
सलामत घर लौटने की उम्मीद भी,
कभी पैसों की चिंता तो कभी भोजन की परवाह लोंगो में,
वो गम में डूबी और हौसलों से सराबोर भी,
कहीं खो न जाए कोई अपना,
अपने पिता की एक नन्हीं सी जान है अभी वो,
लेकिन उसे खबर भी नहीं कि अब मुलाकात न होंगी,
अचानक एक दिन बेजान शरीर घर आयीं,
वह भी जाना चाहती थी साथ उसके,
जिसका हाथ थामे चली थी बाबुल के घर से,
मगर अपने नन्ही सी परी को ,
अभी दुनियां से रूबरू  करवाना है,
सब इस दुःखद घड़ी में आ रहे है,
दूर खड़े उदास हज़ार चेहरे है,
वह सीने पर सिर रख ,
यमराज से लौटाने की ज़िद कर रही,
हर क्षण,प्रति पल कोई न कोई शमसान जा रहा,
एक ही क्षण में वो,सुहागन विधवा कहलाने लगी,
बड़ी शालीनता से दूसरों को हाथ दे चूड़िया तोड़वा रही वो,
सबके चले जाने की उम्मीद मन में लिए ,
फिर से कब्र जाने की सोच रही वो,
न जाने क्यों उसे अब अस्तित्व रहित स्त्री से,
अस्तित्वहीन मान लिया गया,
न जाने क्यों उस नन्ही सी जान को अब,
अनाथ सा और मनहूस मान लिया गया,
न जाने क्यों उस माँ बेटी को अब,
दयनीय मान लिया गया,
न जाने क्यों अब उसे श्रृंगारहीन मान लिया गया,
न जाने क्यों उस स्त्री के जीवन को अब,
सार हीन मान लिया गया,
न जानें क्यों उसे अब,
सार्वजनिक संपत्ति सा मान लिया गया,
आखिर क्यों और कब  तक ?


Menstrual cycle

"What is bleeding-discomfort!"





When I saw it for the first time, I realized
If something happened to me, it didn't go away.
Somewhere I'm not going to die,
Thought, why is this with me?
cried, cried and then know
Let it be life giving
First step!

Then I felt more than giving life
Nothing can be holy
Illusion broken, hey in these days you
have become untouchables and sinners,
So here you stepped in the kitchen
On the other hand, the whole kitchen became impure.
Can't give food or water to men,
It is a sin to even see the room of worship.
Thought maybe there is culture, then
bleeding is divine, worshiped and
Also found as almighty,
I have been thinking since then.

Saw this happening every month, not only here,
It's a shame to even talk about it
Also seen ,
Anxious, troubled, restless I have seen myself
Didn't come anywhere before it started, wo mn
Have to prepare four days in advance,
If I go to a temple somewhere and then it happens,
I do not feel any sin, I am traveling, hey
Will wear something black or dark, people see
If you will laugh for it, the driver above does not stop the bus,
There is no women toilet everywhere, what should I do?

This stripping pain from above,
I can't sit in one place for long
It would be nice if someone kisses his head with love,
But good to take care!
We do our work with utmost sincerity and will
The mentality gives us more trouble!

I can't imagine that it's in the second quote,
It can't be true, because I haven't heard that
Wherever it is mentioned or written,
Or just someone made them at their convenience,
Somebody believed and then went on to believe, someone from us (female)
asked how do you feel, what do you want,
No, but if this (bleeding) does not happen, even then they
Taunts meet you know what, wretched, unholy, sin
That would have happened in the last life, etcetera - etcetera!

There is also revenge now - something can tell father, brother, now,
Everything is like normal days, whatever one likes,
Somewhere we, our companions, take great care of them, give love, the first bleeding celebrates happiness,
Believes to be worshiped, but it's just a little bit
There are people,,,,,,, which are really praiseworthy.
Mahima Singh ©

Tuesday, May 17, 2022

"रक्तस्राव(पीरियड्स)- बेचैनी क्या होती है"

 
"रक्तस्राव-बेचैनी क्या होती है!"

पहली बार देखा तो खयाल आया,
कहीं मुझे कुछ हो तो नहीं गया,
कहीं मैं मरने वाली तो नहीं हूं,
सोचा, ऐसा मेरे साथ ही क्यों?
चिल्लाई,रोई और फिर पता 
चला यह तो जीवनदायनी होने की
प्रथम सीढ़ी है !

फिर मुझे लगा जीवन देने से ज्यादा 
पवित्र तो कुछ भी नहीं हो सकता,
भ्रम टूटा, अरे इन दिनों में तुम 
अछूत और पापी हो गयी हो,
रसोई में तो यहाँ तुम कदम रखी
उधर पूरा रसोई घर अपवित्र हुआ,
न पुरुषों को खाना -पानी नहीं दे सकती ,
पूजा का कमरा तो देखना भी पाप है,
लगा कि शायद संस्कृति है,फिर
रक्तस्राव को दैवीय ,पूजित और
सर्वशक्तिमान के रूप में भी पाया,
तब से सोच में ही हूं🤔

यही हर मास होता देखा यहीं नहीं,
इस पर बात करना भी शर्मिंदगी है 
यह भी देखा 🤨,
तqड़पते,परेशान,बेचैन देखा है खुद को 
शुरू होने से पूर्व कहीं आ तो नहीं गया, wo mn
चार दिन पहले से तैयारी करके रखना है,
कहीं मंदिर जाऊ और फिर हो गया तो,
क aहीं पाप न लगे,यात्रा कर रही हूं ,अरे
कुछ काला या डार्क पहनूँगी,लोग देख 
लिए तो हसेंगे,ऊपर ड्राइवर बस तो रोकता नहीं,
हर जगह महिला शौचालय तो नहीं है न ,क्या करूँ!

ऊपर से यह खाल उधेड़ देने जैसी पीड़ा,
लंबे समय तक एक जगह नहीं बैठ सकती मैं,
थोड़ा कोई प्यार से सिर सहला दे तो अच्छा लगता,
लेकिन ख्याल के लिए अच्छा है!
हम अपना काम पूरी निष्ठा से करते है और करेंगे
हमें(स्त्री) तो ज्यादा तकलीफ़ मानसिकता देती है!

सोच नहीं पाती हूं मैं कि यह जो दूसरे उद्धरण में है,
यह सच तो नहीं हो सकता है ,क्योंकि सुना नहीं कि
कहीं यह वर्णित है या लिखित है,
या यों ही इनको किसी ने अपनी सहूलियत में बनाया,
किसी ने माना फिर मानते गए, किसी ने हमसे(स्त्री)
पूछा कि तुम कैसा महसूस करती हो, क्या चाहती हो,
नहीं लेकिन यह(रक्तस्राव)न हो तो ,उसपर भी उनको 
ताने मिलते है जानते हो क्या , मनहूस,अपवित्र,पाप
की होगी पिछले जनम में ,वगैरह -वगैरह!

बदला भी है अब कुछ- कुछ ,पिता ,भाई को बता सकती है अब,
सामान्य दिनों की तरह सब है उसको जो मन करती है,
कहीं-कहीं उनके हम साथी ,अपने ,उनका बहुत खयाल रखते है,प्यार देते है ,पहली रक्तस्राव खुशियां मनाते है,
पूजित मानते  है,,, लेकिन यह बस कुछ बिल्कुल थोड़े 
लोग है ,,,,,,, जो वाकई क़ाबिले तारीफ है 💐
Mahima Singh©



Friday, December 24, 2021

रेत और जिंदगी





रेत सी है जिंदगी ,
मुट्ठी से जैसे फिसलती जा रही,
हर कण, हर दिन की तरह ढल रही है,
कभी ज्यादा कभी कम गिरती रेत,
जीवन के उतार-चढ़ाव,दुख -सुख की तरह है!

रेत सी है जिंदगी,
मुट्ठी खोल दी एक पल में बिखर जाए,
यूं जिंदगी हो या दिल के दरवाज़े खोल ,
इंतजार क्यों किसी और का खुद की उड़ान में,
झांक अपने अक्स को आइने में,
बस तुम हो जो बदल सकते हो कल को !

माना रेत सी है जिंदगी,
मग़र कण-कण में जिंदगी तो है,
कुछ चमकता सा तो  कुछ धुंधला सा है,
जरा सी रोशनी तो दो खुद के उजालों की,
कण-कण चमकती रेत सा तुम खुद को देखोगे!

है उजाला अपार खुद के ही अंतस में,
दूसरों के उजालों से खुद को चमकाना है क्यों,
जर्रा-जर्रा चमक उठा खुद के उजालों से ,
बस दो चमक खुद के कणों को !

माना रेत सी है जिंदगी,
फिसलती ही जा रही ,मगर
कण-कण चमकती रेत है गवाह,
खुद के उजालों की ....!
महिमा यथार्थ©

22 may CA